उपवास में प्याज क्यों नहीं खानी चाहिए? क्या भगवान प्याज को भोजन नहीं मानते हैं?

Siddharth Jain · 12 Oct 2025

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हिन्दू धर्म में उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन, वाणी और विचारों की शुद्धि का माध्यम माना गया है। उपवास के दौरान केवल सात्त्विक भोजन करने की परंपरा है। सात्त्विक आहार वह होता है जो मन को शांत, पवित्र और स्थिर रखे। इसके विपरीत प्याज और लहसुन को तामसिक या राजसिक आहार की श्रेणी में रखा गया है। प्याज और लहसुन का धार्मिक दृष्टिकोण से निषेध: शास्त्रों के अनुसार प्याज और लहसुन शरीर में तामसिक प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं, जिससे क्रोध, आलस्य और इन्द्रिय-भोग की भावना बढ़ती है। यही कारण है कि पूजा-पाठ, उपवास या ध्यान के समय इन्हें खाने से मना किया गया है। ‘मनुस्मृति’ और ‘स्कंद पुराण’ में यह वर्णन मिलता है कि जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य, साधना या भक्ति मार्ग पर चलता है, उसे प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा जैसे पदार्थों से दूर रहना चाहिए। भगवद गीता का दृष्टिकोण: भगवद गीता (अध्याय 17, श्लोक 7–10) में भगवान श्रीकृष्ण ने भोजन को तीन गुणों में बाँटा है — सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। सात्त्विक भोजन: जो आयु, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाए। राजसिक भोजन: जो अत्यधिक तीखा, खट्टा, नमकीन, गर्म या कषाय हो। तामसिक भोजन: जो बासी, दुर्गंधयुक्त या हिंसा से प्राप्त हो। प्याज और लहसुन राजसिक-तामसिक भोजन माने गए हैं, जो मनुष्य की मानसिक शांति को भंग करते हैं और इंद्रियों को उत्तेजित करते हैं। इसलिए भगवद गीता के सिद्धांत के अनुसार, उपवास या ध्यान के समय इनका त्याग श्रेष्ठ माना गया है। आध्यात्मिक कारण भक्त उपवास के समय केवल शरीर को नहीं, बल्कि आत्मा को भी शुद्ध करने का प्रयास करता है। जब मन सात्त्विक रहता है, तभी ईश्वर से एकाग्र होकर जुड़ना संभव होता है। प्याज जैसे पदार्थ मन की स्थिरता को बाधित करते हैं, इसलिए इन्हें उपवास में नहीं लिया जाता। निष्कर्ष भगवान प्याज को "भोजन नहीं मानते" ऐसा कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, लेकिन धार्मिक और योगिक परंपरा में यह माना गया है कि जो भोजन मन और आत्मा की शांति में बाधक हो, वह भक्ति मार्ग में उचित नहीं। अतः उपवास के दिन प्याज और लहसुन से परहेज़ आत्मिक साधना को और पवित्र बनाता है।