शुभ और अशुभ क्या है?

Siddharth Jain · 23 Sept 2025

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मानव जीवन में हर कार्य को दो दृष्टियों से देखा जाता है – शुभ और अशुभ। हिंदू धर्म और शास्त्रों में शुभ और अशुभ का बड़ा गहरा अर्थ बताया गया है। यह केवल कर्म या दिन-तिथि का सवाल नहीं, बल्कि मन, आचरण और विचारों से भी जुड़ा है। शुभ क्या है? सकारात्मक ऊर्जा और सद्भावना से जुड़ी हर बात शुभ मानी जाती है। जब कोई कार्य धर्म, सदाचार और पवित्रता के साथ किया जाए तो वह शुभ होता है। उदाहरण: दान करना सत्य बोलना दूसरों की सेवा करना पूजा-पाठ और भक्ति करना नए कार्य का शुभ मुहूर्त देखकर आरंभ करना शुभ कार्य से मन को शांति, परिवार को सुख और समाज को समृद्धि मिलती है। अशुभ क्या है? जो कार्य अधर्म, अनैतिकता और नकारात्मकता से जुड़े हों, वे अशुभ कहलाते हैं। यह केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि मन की बुरी प्रवृत्तियाँ भी अशुभ हैं। उदाहरण: झूठ बोलना चोरी, छल या हिंसा करना माता-पिता या गुरु का अपमान करना नशा और पाप कर्म करना बिना विचार किए गुस्से में आकर निर्णय लेना अशुभ कार्य से मन अशांत होता है, परिवार में क्लेश आता है और जीवन में बाधाएँ बढ़ती हैं। शास्त्रों की दृष्टि मनुस्मृति में कहा गया है: “सत्कर्म से सुख और पापकर्म से दुख मिलता है।” गीता में भगवान कृष्ण ने शुभ और अशुभ को कर्म और विचारों से जोड़ा है। संत कबीर ने भी कहा है – “मन का मैल ही अशुभ है, और मन की निर्मलता ही शुभ है।” निष्कर्ष शुभ और अशुभ केवल दिन, तिथि या मुहूर्त पर निर्भर नहीं करते, बल्कि यह हमारे कर्म और विचारों से तय होते हैं। यदि हम सत्य, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलें तो सब कुछ शुभ हो जाता है। यदि हम झूठ, छल और अधर्म की ओर बढ़ें तो वही कार्य अशुभ बन जाता है। इसलिए जीवन में हमेशा ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे आत्मा को शांति और समाज को सुख मिले – यही सच्चा शुभ है।