नवरात्रि में प्याज़ और लहसुन क्यों नहीं खाना चाहिए?

Siddharth Jain · 27 Sept 2025

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नवरात्रि हिंदू धर्म का प्रमुख उत्सव है, जिसमें नौ दिनों तक देवी दुर्गा की आराधना की जाती है। इन दिनों भक्तजन उपवास रखते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और सात्त्विक आहार का पालन करते हैं। परंपरा के अनुसार नवरात्रि में प्याज़ और लहसुन का सेवन वर्जित माना गया है। प्रश्न यह है कि आखिर इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से क्या कारण हैं? १. धार्मिक दृष्टिकोण हिंदू धर्मग्रंथों में उपवास और व्रत के समय सात्त्विक भोजन को ही स्वीकार्य माना गया है। प्याज़ और लहसुन को राजसिक और तामसिक आहार की श्रेणी में रखा गया है। राजसिक आहार इंद्रियों को उत्तेजित करता है और मन को चंचल बनाता है। तामसिक आहार आलस्य, अज्ञान और नकारात्मक विचारों को बढ़ाता है। व्रत का मुख्य उद्देश्य मन और आत्मा को पवित्र करना होता है। ऐसे में प्याज़ और लहसुन का सेवन साधक के ध्यान और पूजा में विघ्न डाल सकता है। २. आयुर्वेदिक दृष्टिकोण आयुर्वेद में भोजन को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है – सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। प्याज़ और लहसुन को तामसिक माना गया है। ये शरीर में उष्णता और उत्तेजना बढ़ाते हैं। अधिक मात्रा में सेवन से पाचन में भारीपन और गैस की समस्या हो सकती है। ध्यान और मानसिक शांति के समय इनका प्रभाव मन को स्थिर होने से रोकता है। ३. अगर नवरात्रि में प्याज़-लहसुन खा लिया जाए तो क्या हो सकता है? धार्मिक दृष्टि से उपवास की शुद्धता भंग मानी जाएगी। भक्त को व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलेगा। मानसिक रूप से एकाग्रता और ध्यान में कमी आ सकती है। शरीर पर इसका प्रभाव पाचन संबंधी असुविधा और आलस्य के रूप में दिख सकता है। आध्यात्मिक साधना के समय मन अशांत और विचलित हो सकता है। ४. विकल्प और सात्त्विक आहार नवरात्रि में आलू, कुट्टू का आटा, साबूदाना, फल, दूध, दही और सूखे मेवे जैसे सात्त्विक आहार को प्राथमिकता दी जाती है। ये भोजन न केवल शरीर को ऊर्जा देते हैं बल्कि मन को भी शांत और स्थिर बनाए रखते हैं। निष्कर्ष नवरात्रि केवल व्रत का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और भक्ति का अवसर है। प्याज़ और लहसुन जैसे तामसिक आहार से परहेज़ करके साधक अपने शरीर, मन और आत्मा को सात्त्विक ऊर्जा से भर सकते हैं। यदि कोई भूलवश इनका सेवन कर ले, तो इसे पाप नहीं माना जाता, लेकिन व्रत की शुद्धता प्रभावित होती है। इसलिए श्रद्धा और भक्ति के साथ सात्त्विक आहार का पालन करना ही श्रेष्ठ माना गया है।