मावस (अमावस्या) और श्राद्ध के अंतिम दिन का महत्व

Siddharth Jain · 20 Sept 2025

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हिंदू धर्म में अमावस्या (मावस) और श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व है। अमावस्या को नया चाँद न होने के कारण इसे आध्यात्मिक साधना, पितृ तर्पण और दान-पुण्य का दिन माना जाता है। वहीं, श्राद्ध का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है, जिस दिन सभी पितरों को सामूहिक रूप से तर्पण दिया जाता है। मावस (अमावस्या) के दिन क्या करना चाहिए? पितृ तर्पण और पिंडदान – इस दिन पितरों के लिए तर्पण करना विशेष पुण्यदायी होता है। स्नान और संकल्प – प्रातःकाल गंगा या पवित्र नदी में स्नान कर संकल्प लेना चाहिए। दान-पुण्य – गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र और अन्न का दान करने का महत्व है। दीपदान – शाम को घर और नदी किनारे दीपदान करने से अंधकार दूर होता है और शांति मिलती है। उपवास या साधना – बहुत से लोग इस दिन उपवास रखकर ईश्वर और पितरों की पूजा करते हैं। श्राद्ध के अंतिम दिन (सर्वपितृ अमावस्या) का महत्व श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है। जिन लोगों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, वे इस दिन श्राद्ध करते हैं। यह दिन उन सभी पितरों की शांति के लिए होता है जिन्हें पूरे पक्ष में विशेष तिथि पर श्राद्ध नहीं मिला। इस दिन का किया गया तर्पण और दान सभी पितरों को तृप्त करता है और परिवार पर आशीर्वाद की वर्षा होती है। क्या नहीं करना चाहिए? मांस, मदिरा या तामसिक भोजन का सेवन। कटु वचन, झगड़ा या क्रोध। दूसरों को कष्ट देना या दान से पीछे हटना। निष्कर्ष मावस का दिन अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है और श्राद्ध का अंतिम दिन पितरों की सामूहिक शांति का प्रतीक। इन दिनों में यदि श्रद्धा और भक्ति से तर्पण, दान और साधना की जाए तो पितरों की कृपा से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।