करवाचौथ की कथा
Siddharth Jain · 10 Oct 2025
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करवाचौथ का व्रत भारत में विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु और सुखमय जीवन के लिए किया जाता है। यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ सुबह सूर्योदय से पहले सर्ग (भोजन) करती हैं और फिर पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं — यानी न कुछ खाती हैं, न पानी पीती हैं।
करवाचौथ की कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है। कहा जाता है कि एक समय की बात है — एक ब्राह्मण की सात बेटियाँ थीं। उनमें से सबसे छोटी बहन का नाम करवा था। जब करवा ने करवाचौथ का व्रत रखा, तो उसके भाइयों को बहन का भूखा रहना सहन नहीं हुआ। उन्होंने धोखे से आसमान में दर्पण दिखाकर कहा कि चाँद निकल आया है। यह सुनकर करवा ने व्रत तोड़ दिया। कुछ ही समय बाद उसके पति की तबीयत बिगड़ गई और वह बेहोश हो गया।
करवा को बहुत दुख हुआ। उसने सच्चे मन से देवी माता से प्रार्थना की और अपने अपराध की क्षमा माँगी। देवी ने प्रसन्न होकर कहा कि अगले वर्ष सच्चे नियमों के साथ व्रत करने से उसका पति पुनः स्वस्थ हो जाएगा। अगले साल करवा ने पूरे विधि-विधान से करवाचौथ का व्रत किया और उसके पति को नया जीवन मिला। तभी से यह व्रत हर वर्ष श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाने लगा।
करवाचौथ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्त्री के समर्पण, प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व हर पत्नी को यह संदेश देता है कि सच्ची निष्ठा और आस्था से किया गया व्रत जीवन में शुभता और सौभाग्य लाता है।