कलियुग क्या है?
Siddharth Jain · 14 Sept 2025
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हिंदू धर्म में समय को चार युगों में बाँटा गया है – सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। इन चारों युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है। वर्तमान में हम कलियुग में जी रहे हैं। पर प्रश्न यह है कि आखिर कलियुग क्या है और इसकी विशेषताएँ क्या हैं?
कलियुग की परिभाषा
“कलि” का अर्थ है कलह, पाप और अधर्म।
“युग” का अर्थ है समय का बड़ा कालखंड।
इसलिए कलियुग का अर्थ है वह समय जब अधर्म, असत्य, लोभ और मोह का प्रभाव बढ़ जाता है।
कलियुग की अवधि
शास्त्रों के अनुसार, कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 वर्ष है।
इसकी शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान (मृत्यु) के बाद से मानी जाती है, लगभग 3102 ईसा पूर्व।
अभी तक कलियुग का लगभग 5,000 वर्ष ही बीता है।
कलियुग की विशेषताएँ
धर्म की हानि – चार पैरों वाले धर्म (सत्य, तप, दया, शौच) में से केवल एक सत्य शेष रहता है।
पाप की वृद्धि – झूठ, चोरी, हिंसा और पाखंड बढ़ता है।
भौतिकता का प्रभाव – लोग धन और सुख-सुविधाओं को ही जीवन का लक्ष्य मानने लगते हैं।
संबंधों में दूरी – परिवार और समाज में कलह बढ़ता है।
आयु में कमी – मनुष्य की औसत आयु घटती है और स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती हैं।
भक्ति का सरल मार्ग – कलियुग की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें केवल भगवान का नाम जपने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
शास्त्रों में वर्णन
भागवत पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मनुष्य का मन अधिकतर लोभ, वासना और असत्य की ओर झुका रहता है।
परंतु यह भी कहा गया है कि “कलियुग में केवल हरि नाम ही उद्धार का मार्ग है।”
निष्कर्ष
कलियुग एक ऐसा युग है जिसमें पाप और अधर्म का प्रभाव सबसे अधिक है। परंतु इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भगवान का स्मरण करना और नाम जपना अत्यंत सरल और प्रभावी माना गया है।
कलियुग हमें यह सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, भक्ति और सत्य की राह पकड़कर मनुष्य मोक्ष पा सकता है।