हमारे धर्म में रंग को लेकर भेदभाव क्यों है
Siddharth Jain · 3 Nov 2025
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भारतीय संस्कृति की जड़ें बेहद गहरी हैं, जहाँ धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक विचार मानव जीवन को दिशा देते हैं। फिर भी समय के साथ समाज ने कुछ ऐसी मान्यताएँ विकसित कर लीं जो मूल धार्मिक सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं। इनमें से एक है रंग को लेकर भेदभाव। अक्सर यह भ्रम पैदा होता है कि रंग आधारित पूर्वाग्रह धर्म की देन है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
हिंदू धर्म के वेद, उपनिषद, पुराण और भक्ति साहित्य मनुष्य के बाहरी स्वरूप को नहीं, बल्कि उसके कर्म, विचार, चरित्र और आत्मिक गुणों को सर्वोपरि मानते हैं। भगवान कृष्ण स्वयं सांवले वर्ण के प्रतीक हैं, और फिर भी वे प्रेम, करुणा, कर्तव्य और धर्म के आदर्श रूप में पूजे जाते हैं। यदि धर्म रंग को महत्व देता, तो कृष्ण, राम, द्रौपदी, संत रविदास, कबीर जैसे आदर्श व्यक्तित्व समाज में सर्वोच्च स्थान कैसे प्राप्त करते?
फिर भी इतिहास के कुछ चरणों में समाज ने अपनी सुविधाओं, सामंती सोच और श्रेणी आधारित व्यवस्था के कारण बाहरी रूप को महत्व देना शुरू कर दिया। यही से रंग, जाति और रूप पर आधारित मानसिकता विकसित हुई। यह सामाजिक प्रभाव समय के साथ इतना गहरा हो गया कि लोग इसे धर्म से जोड़ने लगे, जबकि धर्म का मूल संदेश बिल्कुल विपरीत है।
धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि मानव शरीर एक अस्थायी आवरण है और आत्मा ही वास्तविक पहचान है। भगवान कबीर ने कहा, "जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान", और यही संदेश हमारी आध्यात्मिक परंपरा की नींव है। परंतु धीरे-धीरे समाज में बाहरी दिखावे और भौतिक मानकों ने महत्व लेना शुरू किया और यही से रंग आधारित भेदभाव का बीज पड़ा।
आज आवश्यकता है कि हम धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें। हमें यह स्वीकारना होगा कि ईश्वर के सामने सभी मनुष्य समान हैं और किसी का मूल्य उनके रंग से नहीं, बल्कि उनके कर्म और भावनाओं से निर्धारित होता है। आधुनिक समय में शिक्षा, जागरूकता और आध्यात्मिक समझ के माध्यम से यह धारणा पुनः मजबूत हो रही है कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य को जोड़ना है, तोड़ना नहीं।
यदि हम धर्म की सच्ची शिक्षा को जीवन में उतारें, तो हम समझ पाएँगे कि सुंदरता किसी रंग में नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों में बसती है। समाज तब ही श्रेष्ठ बनेगा जब हम हर व्यक्ति को समान सम्मान दें और किसी की पहचान उसके गुणों के आधार पर करें, न कि उसके रंग के आधार पर।