भारत में छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली की परंपरा कब से मानी जा रही है?
Siddharth Jain · 15 Oct 2025
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दीवाली भारत का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध त्योहार है, जो हजारों वर्षों से हिंदू संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है।
आज हम इसे “छोटी दिवाली” और “बड़ी दिवाली” के रूप में मनाते हैं, परंतु यह परंपरा बहुत पुराने वैदिक और पौराणिक काल से चली आ रही है।
आइए जानते हैं कि भारत में छोटी और बड़ी दिवाली कब से और क्यों मनाई जाने लगी।
दीवाली का ऐतिहासिक आरंभ:
दीवाली की परंपरा का उल्लेख ऋग्वेद, पद्म पुराण, स्कंद पुराण और कालिका पुराण जैसे ग्रंथों में मिलता है।
प्राचीन भारत में इसे कार्तिक अमावस्या के दिन “दीपदान उत्सव” कहा जाता था।
लोग उस दिन तेल के दीये जलाकर देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आराधना करते थे।
धीरे-धीरे यह परंपरा “दीपावली” के रूप में विकसित हुई, जिसका अर्थ है — “दीपों की पंक्ति”।
छोटी दिवाली का प्रारंभ कब हुआ:
छोटी दिवाली, जिसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है, की परंपरा महाभारत काल से पहले से चली आ रही है।
पुराणों के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने असुर नरकासुर का वध किया था, जिसने देवताओं और संतों को अत्याचार से मुक्त कराया।
यह घटना द्वापर युग में हुई मानी जाती है।
तब से इस दिन को अंधकार और पाप के नाश का प्रतीक दिवस माना जाने लगा।
छोटी दिवाली की पूजा में तेल स्नान, दीप प्रज्वलन और यमराज की आराधना की परंपरा प्रचलित हुई।
कहा जाता है कि इस दिन प्रातःकाल तेल से स्नान कर दीप जलाने से मृत्यु का भय समाप्त होता है और सौभाग्य बढ़ता है।
बड़ी दिवाली की शुरुआत कब से मानी जाती है:
बड़ी दिवाली का संबंध त्रेतायुग से है।
जब भगवान श्रीराम 14 वर्षों का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे, तब अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से सजाकर उनका स्वागत किया।
यह घटना त्रेतायुग के अंत की मानी जाती है, और तभी से कार्तिक अमावस्या को “दीपोत्सव” के रूप में मनाया जाने लगा।
इसके बाद द्वापर युग में भी इसी दिन भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से विवाह किया, ऐसा उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है।
इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन की परंपरा आरंभ हुई।
इतिहास में दीवाली का विस्तार:
समय के साथ दीवाली केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पर्व बन गई।
मौर्य, गुप्त और चोल साम्राज्य के समय में दीवाली राजकीय उत्सव के रूप में मनाई जाने लगी।
राजाओं के दरबारों में दीपदान, दान और उत्सवों का आयोजन किया जाता था।
मध्यकालीन भारत में भी इस पर्व का स्वरूप जीवित रहा — विशेष रूप से राजा हर्षवर्धन और विजयनगर साम्राज्य के काल में इसे “महोत्सव” कहा गया।
निष्कर्ष
भारत में छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है।
छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी) का प्रारंभ द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के समय से हुआ,
जबकि बड़ी दिवाली (दीपावली) का प्रारंभ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने के उपलक्ष्य में हुआ।
आज भी यह दोनों तिथियाँ मिलकर हमें याद दिलाती हैं — पहले अंधकार का नाश करो (छोटी दिवाली), फिर प्रकाश का स्वागत करो (बड़ी दिवाली)।