अष्टमी व्रत और पूजा की शुरुआत कैसे हुई और क्यों की जाती है?

Siddharth Jain · 13 Oct 2025

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अष्टमी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र तिथि मानी जाती है। यह तिथि हर महीने के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में आती है, परंतु चैत्र और आश्विन मास की अष्टमी, जिसे क्रमशः राम नवमी से पहले की दुर्गाष्टमी और महाअष्टमी कहा जाता है, विशेष रूप से पूजनीय होती है। अष्टमी का संबंध माता दुर्गा से है और नवरात्रि के आठवें दिन माता के अष्टम रूप महागौरी की पूजा की जाती है। अष्टमी की शुरुआत कैसे हुई अष्टमी व्रत और पूजा का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों जैसे देवी भागवत पुराण, मार्कंडेय पुराण और कालिका पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार, जब राक्षस महिषासुर के अत्याचार से तीनों लोक त्रस्त हुए, तब देवताओं की सामूहिक शक्ति से माता दुर्गा का आविर्भाव हुआ। महिषासुर का वध नवरात्रि के दौरान हुआ और अष्टमी तिथि पर माता ने विजय की दिशा में निर्णायक युद्ध किया। इसी घटना की स्मृति में अष्टमी के दिन दुर्गा की पूजा प्रारंभ हुई। अष्टमी व्रत का धार्मिक महत्व अष्टमी को “महाअष्टमी” कहा जाता है क्योंकि इस दिन शक्ति की उपासना अपने चरम पर होती है। इस दिन उपवास, कन्या पूजन, हवन और देवी पाठ करना शुभ माना गया है। माना जाता है कि जो भक्त अष्टमी के दिन मां दुर्गा का विधिवत पूजन करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल प्राप्त होता है और जीवन से पापों का नाश होता है। अष्टमी व्रत क्यों किया जाता है अष्टमी व्रत का उद्देश्य केवल माता की कृपा प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और नारी शक्ति के सम्मान को भी दर्शाना है। देवी दुर्गा को शक्ति, साहस और धर्म की प्रतीक माना गया है। इस दिन उपवास रखने से मन की एकाग्रता बढ़ती है और भक्त का मन भक्ति में स्थिर होता है। कई भक्त इस दिन कन्या पूजन करते हैं, जिसमें 9 छोटी बालिकाओं को माता का रूप मानकर भोजन कराया जाता है। यह प्रतीक है कि प्रत्येक नारी में देवी की शक्ति निहित है। अष्टमी पूजा की विधि (संक्षेप में) सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। माता दुर्गा या महागौरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीपक जलाएं, पुष्प, धूप और अक्षत अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती या देवी कवच का पाठ करें। कन्या पूजन करें और उन्हें भोजन व उपहार दें। अंत में आरती कर देवी से आशीर्वाद प्राप्त करें। निष्कर्ष अष्टमी की पूजा केवल परंपरा नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति के आदर और आत्मिक जागरण का प्रतीक है। यह तिथि हमें सिखाती है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वरीय शक्ति धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती है। अतः अष्टमी का व्रत श्रद्धा, भक्ति और आत्मसंयम का सुंदर संगम है जो भक्त के जीवन को शक्ति, शांति और समृद्धि से भर देता है।